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नर्सिंग के पेशे में मिसाल बनीं सात सहेलियों की दोस्ती

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*सातों हैं एक दूसरे के सुख-दुख की साथी, एक रिटायर हो चुकीं, बाकी आगामी वर्षों में पूरी करेंगी अपना सेवाकाल*

भिलाई। नर्सिंग के पेशे में तीन दशक पहले आईं अलग अलग क्षेत्र की 7 महिलाएं अपनी दोस्ती की वजह से मिसाल बन गई हैं। शुरुआती ज्वाइनिंग के बाद संयोग से सभी की आसपास ही पोस्टिंग रही। सभी ने पूरे सेवाकाल में एक दूजे का साथ निभाते हुए अपनी नौकरी की। सभी को साथ-साथ पदोन्नति भी मिली। अब इनमें से एक सेवानिवृत्त हो चुकीं हैं और बाकी जल्द ही अपना सेवाकाल पूरा कर लेंगी। इसके बावजूद इनकी दोस्ती हमेशा बरकरार है और रहेगी।
इन 7 सहेलियों में सभी अलग अलग समुदाय की प्रतिनिधि हैं और किसी ने भी नहीं सोचा था कि एक साथ एक ही विभाग में शासकीय सेवा का अवसर मिलेगा।

Img 20250626 wa0013इनकी दोस्ती की शुरुआत का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। श्रीमती आर विश्वास की पढाई भिलाई में हुई। 11 वी के बाद मां की इच्छा के अनुरूप उन्होंने 1986 में नर्सिंग का कैडर चुना। भले ही उनका मन बिल्कुल नहीं था फिर भी रायपुर में ऑक्जिलरी नर्स मिडवाइफ (एएनएम) का 18 माह का प्रशिक्षण शुरू किया। वहां उनकी मुलाकात सुरेखा ताम्रकार, चंद्रकांता (साहू) कश्यप, अमरीका देशलहरे, देवकी सिन्हा और मनोरमा धांडे से हुई। ये सभी दुर्ग जिले के विभिन्न क्षेत्रों से इसी प्रशिक्षण के लिए आई थी।

श्रीमती विश्वास बताती हैं, प्रशिक्षण के 2 माह बाद दिल हुआ सब छोड़कर घर चले जाएं क्योंकि वार्डन कहीं जाने नहीं देती, बडा सख्त कानून था। वहां का खाना पसंद नहीं आता। महीने में एक बार घर वालों को हास्टल में 10 मिनट मिलने और बातचीत करने का मौका मिलता। यह उनकी अकेले की नहीं बल्कि सभी की थी। ऐसे में 7 सहेलियां एकजुट हुईं और एक दूसरे को मानसिक तौर पर इस प्रशिक्षण के लिए तैयार किया।

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सुरेखा ताम्रकार कहती हैं- हम सबने एक दूसरे को मनाया और इसके बाद सभी ने ट्रेनिंग पूरी की, जिससे सभी का भविष्य बन गया। चंद्रकांता (साहू) कश्यप और अमरीका देशलहरे बताती हैं-इसके बाद सभी की पोस्टिंग अलग-अलग जगहों पर हुई। लेकिन संयोग ऐसा रहा कि कुछ वक्त के बाद सभी ने एक विकास खंड में नर्सिंग सिस्टर के रूप में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाटन के विभिन्न क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं दीं और इस दौरान न जाने कितने सुरक्षित प्रसव के जरिए प्रसूताओं की जान बचाई।
देवकी सिन्हा और मनोरमा धांडे बताती हैं एक समय के पश्चात हम सभी को पदोन्नति का अवसर मिला जिसमें से 5 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के विभिन्न सेक्टरों में महिला पर्यवेक्षिका (एल एच व्ही) बनी। वहीं एक ने दुर्ग विकासखंड और एक ने गुंडरदेही विकासखंड में पदोन्नति पाई। कुछ अरसे बाद सुरेखा राठौर पुनः पाटन आ गई और वर्तमान में एक दुर्ग में पदस्थ हैं।

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श्रीमती चंद्रकांता ने पुनः पदोन्नति पाई और आज विकास खंड चिकित्सा अधिकारी के कार्यालय में खंड विस्तार प्रशिक्षक अधिकारी हैं। इन सात सहेलियों में से अब शासकीय उम्र की निर्धारित आयु सीमा को प्राप्त करते हुए श्रीमती सुरेखा राठौर 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो गई हैं। इस वर्ष एक नवंबर 2025 को एक, शेष 2 आगामी 3 वर्ष में सेवानिवृत्त और एक 2030 में सेवानिवृत्त हो जाएगी। एक दूसरे के सुख दुख की साथी सुरेखा ताम्रकार, चंद्रकांता (साहू) कश्यप , अमरीका देशलहरे, देवकी सिन्हा और मनोरमा धांडे कहती हैं, अपने सेवाकाल में हम सबकी दोस्ती कायम हुई जो आगे सेवानिवृत्ति के बाद भी बरकरार रहेगी। हम सभी एक दूसरे के साथी हैं और आगे भी रहेंगे।

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